क्या आपके हस्ताक्षर बता सकते हैं आपके मन के राज?जीएमसी हल्द्वानी के युवा डॉक्टर का अनोखा शोध बना चर्चा का विषय

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हस्ताक्षर, व्यक्तित्व और मनोविज्ञान के संबंध पर कार्य कर रहे हैं डॉ. सौरभ प्रकाश सिंह; 5000 से अधिक लोगों के हस्ताक्षरों का अध्ययन, 1100+ प्रतिभागियों पर विस्तृत वैज्ञानिक शोध जारी।

हल्द्वानी । किसी व्यक्ति की पहचान उसके चेहरे, आवाज़, फिंगरप्रिंट और व्यवहार से होती है। लेकिन क्या उसके हस्ताक्षर और लिखावट भी उसके व्यक्तित्व, मानसिक स्थिति और व्यवहारिक प्रवृत्तियों के बारे में महत्वपूर्ण संकेत दे सकते हैं? यही प्रश्न आजकल उत्तराखंड के हल्द्वानी में चर्चा का विषय बना हुआ है।

गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज एवं डॉ. सुशीला तिवारी अस्पताल, हल्द्वानी के फॉरेंसिक मेडिसिन विभाग में कार्यरत पीजी रेजिडेंट (एमडी) डॉ. सौरभ प्रकाश सिंह पिछले कई वर्षों से एक अनोखे विषय — फॉरेंसिक ग्राफोलॉजी — पर कार्य कर रहे हैं। उनके शोध का नाम है — “The Mind Behind The Signature”।

इस अध्ययन का उद्देश्य यह समझना है कि किसी व्यक्ति के हस्ताक्षर, लिखावट, पेन का दबाव, अक्षरों की दूरी, लिखने का प्रवाह, कटिंग, घेराव, झुकाव और अन्य लेखन पैटर्न उसके व्यक्तित्व, भावनात्मक स्थिति और व्यवहारिक प्रवृत्तियों के बारे में क्या संकेत दे सकते हैं।

डॉ. सौरभ अब तक 5000 से अधिक लोगों के हस्ताक्षरों और लिखावट का अवलोकन एवं अध्ययन कर चुके हैं। वर्तमान में उनकी विस्तृत रिसर्च स्टडी 1100 से अधिक प्रतिभागियों पर आधारित है, जिसमें विभिन्न मनोवैज्ञानिक और व्यवहारिक समूहों को शामिल किया गया है।

इस अध्ययन में सामान्य व्यक्ति, आत्महत्या का प्रयास कर चुके लोग, ज़हर खाने वाले मामले, फांसी लगाने का प्रयास करने वाले लोग, स्वयं को नुकसान पहुंचाने वाले मामले, मनोरोग विभाग में उपचार प्राप्त कर रहे मानसिक रोगी, आपराधिक प्रवृत्ति वाले व्यक्ति, हल्द्वानी जेल के पुरुष एवं महिला बंदी, तथा गर्भवती महिलाएं शामिल हैं।

इस बड़े शोध का उद्देश्य यह समझना है कि क्या लिखावट और हस्ताक्षर किसी व्यक्ति के अवचेतन मन, तनाव, आक्रामकता, निराशा, असुरक्षा, भावनात्मक संघर्ष और व्यवहारिक अनुकूलन के संकेत दे सकते हैं। डॉ. सौरभ का मानना है — “हर हस्ताक्षर केवल एक नाम नहीं होता, वह व्यक्ति के अवचेतन मन की एक गति होती है।”

इस शोध का एक महत्वपूर्ण हिस्सा अपराध मनोविज्ञान से जुड़ा हुआ है। अध्ययन में जेल बंदियों, आपराधिक प्रवृत्ति वाले व्यक्तियों तथा विभिन्न व्यवहारिक समूहों की लिखावट और हस्ताक्षरों का विश्लेषण किया जा रहा है। इसमें यह समझने का प्रयास किया जा रहा है कि आक्रामकता, आवेगशीलता, अपराधबोध, भावनात्मक दमन और असामाजिक व्यवहार जैसी प्रवृत्तियां लिखावट में किस प्रकार दिखाई दे सकती हैं।

डॉ. सौरभ गर्भवती महिलाओं की लिखावट में होने वाले संभावित परिवर्तनों का भी अध्ययन कर रहे हैं। उनके अनुसार गर्भावस्था के दौरान होने वाले हार्मोनल, भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक बदलाव लिखावट के दबाव, हस्ताक्षर की शैली, अक्षरों की दूरी और लेखन प्रवाह को प्रभावित कर सकते है।

शोध को केवल अवलोकन तक सीमित न रखते हुए डॉ. सौरभ ने इसे BFI-44 Personality Assessment Tool से भी जोड़ने का प्रयास किया है। प्रारंभिक विश्लेषण में कई प्रतिभागियों ने उनके व्यक्तित्व विश्लेषण को आश्चर्यजनक रूप से सटीक बताया।

डॉ. सौरभ अपने शोध को विभिन्न राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय फॉरेंसिक सम्मेलनों में प्रस्तुत कर चुके हैं। ICFMTmidCON-2025 (अल्मोड़ा) में उन्होंने “Signature as a Mirror of Personality: A Forensic Graphological Study on Behavioral Traits in Normal Individuals” विषय पर अपना शोध प्रस्तुत किया।

नवंबर 2025 में कोलकाता में आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन INPALMS-2025 में उन्होंने “The Truth Behind the Signature: Correlating Graphological Personality Predictions with BFI-44 Ratings” शीर्षक से शोध-पत्र प्रस्तुत किया। इस सम्मेलन में भारत सहित विभिन्न देशों से फॉरेंसिक मेडिसिन, मेडिको-लीगल साइंस और व्यवहार विज्ञान के विशेषज्ञों ने भाग लिया। उनके कार्य को विशेषज्ञों द्वारा सराहा गया और इसे एक नवाचारी बहुविषयक शोध प्रयास के रूप में देखा गया।

वर्ष 2026 में आयोजित सम्मेलन में उन्होंने “Neuro-Graphological Analysis of Signature and Handwriting Patterns as Behavioural Markers in Criminal, Suicidal and Psychiatric Individuals” शीर्षक से अपना विस्तारित शोध प्रस्तुत किया तथा तृतीय स्थान (Third Prize) प्राप्त किया।

यह शोध कार्य डॉ. सी. पी. भैसोड़ा (Principal & Dean, Soban Singh Jeena Government Institute of Medical Sciences & Research, Almora) तथा डॉ. आशीष कुमार सिंह (विभागाध्यक्ष, फॉरेंसिक मेडिसिन एवं टॉक्सिकोलॉजी विभाग, गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज हल्द्वानी) के मार्गदर्शन में आगे बढ़ रहा है। डॉ. सौरभ का कहना है “किसी भी शोध की सफलता केवल शोधकर्ता की नहीं होती, बल्कि उसके पीछे शिक्षकों, मार्गदर्शकों और संस्थान का भी महत्वपूर्ण योगदान होता है।”

डॉ. सौरभ भविष्य में ऐसा कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित सिस्टम विकसित करने की दिशा में कार्य करना चाहते हैं जो हस्ताक्षरों और लिखावट के व्यवहारिक पैटर्न का विश्लेषण कर सके। उनका मानना है कि आने वाले समय में फॉरेंसिक विज्ञान, मनोविज्ञान, व्यवहार विज्ञान और कृत्रिम बुद्धिमत्ता मिलकर मानव व्यवहार को समझने के नए रास्ते खोल सकते हैं। डॉ. सौरभ का मानना है कि यदि इस शोध को पर्याप्त वैज्ञानिक मान्यता और अंतरराष्ट्रीय सहयोग प्राप्त हुआ, तो यह केवल एक व्यक्तिगत शोध नहीं रहेगा, बल्कि उत्तराखंड और भारत के लिए गर्व का विषय बन सकता है।

वे कहते हैं — “मेरा सपना है कि हल्द्वानी और उत्तराखंड का नाम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फॉरेंसिक मनोविज्ञान, व्यवहार विज्ञान और ग्राफोलॉजी अनुसंधान के क्षेत्र में स्थापित हो।””हस्ताक्षर कभी सिर्फ हस्ताक्षर नहीं होते…”।

अंत में डॉ. सौरभ मुस्कुराते हुए कहते हैं “जिस प्रकार फिंगरप्रिंट किसी व्यक्ति की अनोखी पहचान होता है, उसी प्रकार उसके हस्ताक्षर भी उसके जीवन के अनुभवों, भावनाओं और सोच की छाप हो सकते हैं।” और शायद यही कारण है कि हल्द्वानी से शुरू हुआ यह अनोखा शोध आज राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों तक अपनी पहचान बना चुका है।

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