हल्द्वानी (नैनीताल) बसंत पांडे
उत्तराखंड के नैनीताल जिले के भाबर क्षेत्र में स्थित बिंदुखत्ता, जहां करीब 99,000 लोग निवास करते हैं, पिछले 80 से अधिक वर्षों से राजस्व ग्राम का दर्जा पाने के लिए संघर्ष कर रहा है। यह क्षेत्र वर्ष 1965-66 में वन विभाग द्वारा आरक्षित वन घोषित कर दिया गया था, जिसके बाद से यहां के निवासी अपनी भूमि के कानूनी मालिकाना हक से वंचित हैं। बैंक ऋण, सरकारी योजनाओं और मूलभूत अधिकारों से महरूम इस क्षेत्र के लोगों को वन विभाग ‘अतिक्रमणकारी‘ करार देता रहा है, जबकि वास्तविकता यह है कि यहां के लोग ब्रिटिश शासनकाल यानी वर्ष 1932 से भी पहले से इस भूमि पर आबाद हैं।

बिंदुखत्ता के ग्रामीणों का आरोप है कि वर्ष 1965-66 में क्षेत्र को आरक्षित वन घोषित करते समय भारतीय वन अधिनियम, 1927 की धारा 3 से 20 तक की अनिवार्य और विस्तृत प्रक्रिया का घोर उल्लंघन किया गया। इस अधिनियम के प्रावधानों के तहत धारा 4 में सरकारी राजपत्र में अधिसूचना जारी कर इरादे की घोषणा, धारा 6 में कम से कम तीन महीने की अवधि में स्थानीय लोगों को अपने अधिकारों का दावा पेश करने का अवसर, और धारा 7 से 19 तक दावों की जांच, सुनवाई व उनका निपटान करने का प्रावधान है। लेकिन वन विभाग ने न तो किसी वन व्यवस्थापन अधिकारी की नियुक्ति की और न ही इनमें से किसी भी धारा का पालन किया।
सूचना के अधिकार (RTI) के तहत जब तराई पूर्वी वन प्रभाग, हल्द्वानी से वन बंदोबस्त अधिकारी की रिपोर्ट मांगी गई, तो एक चौंकाने वाला खुलासा हुआ। केंद्र सरकार, राज्य सरकार, पूर्व में इस क्षेत्र का प्रशासन संभालने वाली उत्तर प्रदेश सरकार और जिला कलेक्ट्रेट—कहीं भी इस आरक्षण से जुड़े कोई दस्तावेज मौजूद नहीं मिले। अंततः तराई पूर्वी वन प्रभाग के प्रभारी वन अधिकारी ने स्वयं शपथ पत्र देकर स्वीकार किया कि “यह अभिलेख/प्रमाण हमारे पास उपलब्ध नहीं है।”

विभाग के अपने रिकॉर्ड ही आपस में टकराते हैं। विभाग के अनुसार, वर्ष 1968 तक बिंदुखत्ता में 3,470 हेक्टेयर भूमि पर अतिक्रमण हो चुका था, जबकि वर्ष 1975 की वन विभागीय रिपोर्ट में वहां केवल 129 परिवार रहने की बात कही गई। वर्ष 1975 में 136 एकड़ भूमि देने पर सहमति बनी थी, लेकिन वन संरक्षक (पश्चिमी वृत्त) की वर्ष 2006 की रिपोर्ट भी यह मानती है कि 1975 में दर्ज निवासियों की संख्या वास्तविकता पर आधारित नहीं थी।
सवाल यह उठता है कि यदि 1968 में हजारों हेक्टेयर पर अतिक्रमण था, तो 1975 में केवल 129 परिवार ही कैसे हो सकते हैं? स्पष्ट है कि वन विभाग स्वयं अपने ही आंकड़ों के जाल में उलझा हुआ है।
राजनेताओं और राजनीतिक दलों के लिए बिंदुखत्ता का मुद्दा हमेशा से एक बड़ा चुनावी दांव रहा है। जून 2024 में जिला स्तरीय वन अधिकार समिति ने सर्वसम्मति से इसे राजस्व ग्राम बनाने की अनुशंसा की, किंतु राजस्व विभाग ने वन क्षेत्र होने के कारण भूमि हस्तांतरण में देरी की आशंका जताते हुए इस घोषणा को विलोपित करने का अनुरोध कर दिया। हालांकि, बाद में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इस घोषणा को पुनर्जीवित करने का अनुमोदन तो कर दिया, लेकिन धरातल पर अब तक कोई ठोस परिणाम सामने नहीं आया है।
वन अधिकार अधिनियम (FRA) 2006 की जानकारी मिलने के बाद बिंदुखत्ता के स्थानीय नागरिकों ने इसके तहत कानूनी लड़ाई शुरू की। इस कानून की धारा 3(1) वन भूमि के कब्जाधारियों को अधिकार पत्र प्रदान करती है। इस प्रक्रिया के तहत ग्राम सभा प्रस्ताव पारित करती है, जिसे उपखंड स्तरीय समिति और तत्पश्चात जिला स्तरीय समिति से अनुमोदित कराया जाता है। देश भर में 1,700 से अधिक गांव इस अधिनियम के तहत राजस्व गांव बन चुके हैं। बिंदुखत्ता का दावा जिला स्तरीय समिति द्वारा पारित किया जा चुका है, लेकिन यह प्रस्ताव पिछले एक वर्ष से शासन स्तर पर लंबित है। वनाधिकार समिति का स्पष्ट मानना है कि एफआरए 2006 के अलावा अब क्षेत्र के पास अन्य कोई विकल्प शेष नहीं है।
सबसे दुखद पहलू यह है कि कई जिम्मेदार अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों को स्वयं वन अधिकार अधिनियम 2006 की पूरी जानकारी नहीं है, जो इस क्षेत्र के विकास में सबसे बड़ा अभिशाप साबित हो रहा है। इसी प्रशासनिक अज्ञानता का परिणाम है कि पुरानी प्रक्रियाओं के सहारे अब एक भी गांव राजस्व गांव का दर्जा नहीं पा सका है।
बिंदुखत्ता का यह प्रकरण भारत में वन प्रशासन की बड़ी विडंबना को बेनकाब करता है, जहां कानूनी लापरवाही, गायब दस्तावेज, विरोधाभासी आंकड़े और राजनीतिक उदासीनता आम नागरिकों की जिंदगी को प्रभावित कर रही है। अब आवश्यकता इस बात की है कि सरकार बिंदुखत्ता को तत्काल राजस्व ग्राम घोषित करे, एफआरए 2006 के प्रावधानों का ईमानदारी से क्रियान्वयन करे और वन विभाग को अपनी त्रुटिपूर्ण व पुरानी अधिसूचना को निरस्त करने का निर्देश दे ताकि लगभग 99,000 निवासियों को उनका जायज मालिकाना हक मिल सके। पीढ़ियों से इस भूमि पर रह रहे इन नागरिकों के अधिकारों की उपेक्षा अब और अधिक समय तक बर्दाश्त नहीं की जा सकती।






