उत्तराखंड में घरेलू वन परमिट के नाम पर खुला अवैध खनन का खेल! कॉर्बेट के जंगलों तक पहुंची

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कॉर्बेट के जंगलों तक पहुंची लूट, अब PMO-NGT तक पहुंची शिकायत

हल्द्वानी, 21 जनवरी 2026: उत्तराखंड के जंगलों और नदियों में घरेलू उपयोग के नाम पर जारी किए जाने वाले वन परमिट अब बड़े पैमाने पर अवैध खनन का हथियार बन चुके हैं। समाजसेवी हेमंत सिंह गौनिया ने इस घोटाले का पर्दाफाश करते हुए प्रधानमंत्री कार्यालय, पर्यावरण मंत्रालय, राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) और उत्तराखंड वन विभाग के शीर्ष अधिकारियों को 20 जनवरी 2026 को विस्तृत शिकायत भेजी है।

यह शिकायत स्पीड पोस्ट और ई-मेल दोनों माध्यमों से दर्ज की गई है, जिससे अब राज्य में हलचल मच गई है।शिकायत के मुताबिक, पूरे उत्तराखंड में ग्राम सभाओं को घरेलू जरूरतों—जैसे मकान निर्माण—के लिए दिए जाने वाले वन परमिटों का संगठित दुरुपयोग हो रहा है। इन परमिटों के जरिए नदियों-नालों से पत्थर, बालू, बजरी और अन्य खनिज सामग्री की खुलेआम लूट की जा रही है, जिसे व्यावसायिक स्तर पर बेचा जा रहा है।यह

खेल किसी एक जिले तक सीमित नहीं, बल्कि राज्य भर में फैला हुआ है—खासकर कॉर्बेट टाइगर रिजर्व से सटे संवेदनशील वन्यजीव कॉरिडोर में।हेमंत गौनिया ने अपनी शिकायत में कई ग्राम सभाओं के नाम स्पष्ट रूप से उजागर किए हैं, जिनमें नाईशीला, कोटाबाग, कालाढूंगी, बसानी, बेल, मीठा आवला, मोना-बाना, कटघरिया, गांधी आश्रम, बोहरा गांव, फतेहपुर, तल्ला इसाई नगर, गुडदौड़ा, चकलुवा, लामाचौड़ आदि शामिल हैं। आरोप है कि इन ग्राम सभाओं के नाम पर फर्जी निरीक्षण रिपोर्ट तैयार की जाती हैं। हर व्यक्ति के नाम अलग-अलग बीट दिखाकर परमिट जारी होते हैं, जबकि तय मात्रा और समय-सीमा का खुलेआम उल्लंघन किया जा रहा है । ट्रैक्टर-ट्रॉली और भारी वाहनों से खनिज का परिवहन गांवों के संकरे रास्तों से हो रहा है, जिससे सड़कें टूट-फूट गई हैं और स्थानीय लोगों—खासकर स्कूली बच्चों और बुजुर्गों—को रोजाना परेशानी झेलनी पड़ रही है।

सबसे गंभीर बात यह है कि यह अवैध गतिविधि रामनगर के कॉर्बेट टाइगर रिजर्व से लगा अति-संवेदनशील वन्यजीव कॉरिडोर में हो रही है। हाथी, बाघ और अन्य जंगली जानवरों की प्राकृतिक आवाजाही बाधित हो रही है, जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष तेजी से बढ़ रहा है। राज्य को राजस्व की भारी चोरी के साथ-साथ पर्यावरण को लंबे समय तक अपूरणीय नुकसान हो रहा है।

समाजसेवी ने स्पष्ट किया है कि ये गतिविधियां भारतीय वन अधिनियम 1927, वन (संरक्षण) अधिनियम 1980, वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम 1972, पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम 1986 और सुप्रीम कोर्ट/NGT के कई आदेशों का सीधा उल्लंघन हैं। उन्होंने मांग की है कि पूरे राज्य में सभी घरेलू वन परमिटों की उच्च स्तरीय, स्वतंत्र जांच हो। जहां वास्तविक निर्माण नहीं हुआ, वहां परमिट तुरंत रद्द किए जाएं। वन्यजीव क्षेत्रों में अवैध खनन-परिवहन पर पूर्ण प्रतिबंध लगे। इसमें शामिल अधिकारियों, कर्मचारियों और बाहरी लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो।

अवैध निकाली गई सामग्री जब्त कर राजस्व वसूला जाए।हेमंत गौनिया ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो वे इस मामले को न्यायालय और अन्य संवैधानिक मंचों तक ले जाएंगे—और इसकी पूरी जिम्मेदारी संबंधित विभागों की होगी। यह शिकायत अब केंद्र सरकार, NGT और राज्य वन विभाग के उच्चतम स्तर तक पहुंच चुकी है, जिससे प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में तेज हलचल मची हुई है। उत्तराखंड के जंगलों और नदियों की लूट अब छिप नहीं सकती—सवाल है, क्या इस बार कार्रवाई होगी या फिर लूट जारी रहेगी?

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