हाईकोर्ट ने याचिका निस्तारित की, लेकिन FRA अधिकारों पर कोई टिप्पणी नहीं – सावधान रहें गलत व्याख्या से

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वन अधिकार समिति की अपील: बिंदुखत्ता को राजस्व गांव बनाने में FRA 2006 कोई बाधा नहीं

लालकुआं। वन अधिकार समिति बिंदुखत्ता तथा पूर्व सैनिक संगठन ने आज एक संयुक्त बैठक आयोजित की, जिसमें विभिन्न समाचार माध्यमों में उत्तराखंड उच्च न्यायालय के 20 मार्च, 2026 के फैसले को गलत तरीके से पेश करने पर गहरी नाराजगी जताई गई। संगठनों ने मीडिया रिपोर्टों में फैसले को ‘बड़ा झटका’ बताए जाने को तथ्यों का अधूरा और भ्रामक चित्रण करार दिया।

उत्तराखंड उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने याचिकाकर्ता भुवन चंद्र पोखरिया की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए याचिका को केंद्र सरकार के 4 दिसंबर, 2006 के आदेश के विपरीत पाया, जिसमें नैनीताल, ऊधम सिंह नगर और चंपावत जिलों को पारिस्थितिकीय रूप से संवेदनशील क्षेत्र घोषित करते हुए वन भूमि को राजस्व गाँव में बदलने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया गया था। यह प्रतिबंध आज भी प्रभावी है।

समिति का कहना है कि यह याचिका मुख्य रूप से 24 फरवरी, 2009 की राज्य के मुख्यमंत्री की प्रशासनिक घोषणा पर आधारित थी, न कि वन अधिकार अधिनियम (FRA) 2006 के संदर्भ में, जिसके तहत ग्रामीणों द्वारा बिन्दुखत्ता को राजस्व गाँव बनाने के दावे को जिलाधिकारी नैनीताल की अध्यक्षता में 19 जून, 2024 को सम्पन्न हुई जिला स्तरीय वनाधिकार समिति की बैठक में सर्वसम्मति से पारित किया गया है और उक्त अधिनियम के तहत जिला स्तरीय वनाधिकार समिति का निर्णय अंतिम होता है।

अदालत ने FRA के तहत वन-निवासियों के व्यक्तिगत या सामुदायिक अधिकारों पर कोई टिप्पणी नहीं की है क्योंकि याचिकाकर्ता ने इस कानून का हवाला ही नहीं दिया। यदि याचिका FRA के आधार पर दायर होती, तो फैसला अलग हो सकता था।

बिंदुखत्ता में करीब एक लाख से अधिक लोग सैकड़ों वर्षों से निवास कर रहे हैं। कई सरकारों ने इसे राजस्व गाँव बनाने की घोषणाएं कीं, लेकिन केंद्रीय प्रतिबंधों के कारण प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी।

वन अधिकार समिति और पूर्व सैनिक संगठन का कहना है कि FRA 2006 की धारा 6 के तहत स्पष्ट प्रावधान है, जिसके माध्यम से बिंदुखत्ता को राजस्व गाँव का दर्जा देने में कोई कानूनी अड़चन नहीं है।

यह केंद्रीय कानून वन संरक्षण अधिनियम की बाधाओं से परे लागू होता है और इसके प्रतिबंध वनवासियों के अधिकारों के निर्धारण में बाधा नहीं डालते।

हाइकोर्ट का यह फैसला याचिका के सीमित दायरे की पुष्टि करता है, न कि वन-निवासियों के दावे को कमजोर करता है।

संगठनों ने बैठक में मीडिया से अपील की कि तथ्यों का संतुलित और सही प्रस्तुतीकरण किया जाए, ताकि क्षेत्रवासियों में अनावश्यक भ्रम व निराशा न फैले।

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