बिंदुखत्ता मामले पर भ्रामक खबरों से सावधान रहने की अपील
लालकुआं।
वन अधिकार समिति बिंदुखत्ता एवं पूर्व सैनिक संगठन की संयुक्त बैठक में उत्तराखंड उच्च न्यायालय के 20 मार्च 2026 के निर्णय को लेकर सोशल मीडिया एवं कुछ मीडिया माध्यमों में फैलाए जा रहे भ्रामक तथ्यों पर गहरी चिंता व्यक्त की गई।

बैठक में स्पष्ट किया गया कि माननीय उच्च न्यायालय द्वारा पारित आदेश को “बड़ा झटका” बताना तथ्यों का अधूरा एवं भ्रामक प्रस्तुतीकरण है। न्यायालय की खंडपीठ द्वारा याचिकाकर्ता की जनहित याचिका को केवल इस आधार पर निस्तारित किया गया कि यह केंद्र सरकार के 4 दिसंबर 2006 के आदेश के विपरीत थी, जिसमें नैनीताल, ऊधम सिंह नगर एवं चंपावत जनपदों में राज्य सरकार के वन भूमि को राजस्व गांव में परिवर्तित करने के प्रस्ताव पर प्रतिबंध लगाया गया था।

संगठनों ने यह भी स्पष्ट किया कि उक्त याचिका वन अधिकार अधिनियम (FRA) 2006 के प्रावधानों पर आधारित नहीं थी, जिसके कारण माननीय न्यायालय ने इस अधिनियम के अंतर्गत मिलने वाले व्यक्तिगत एवं सामुदायिक अधिकारों पर कोई टिप्पणी नहीं की।

बैठक में सर्वसम्मति से यह मत व्यक्त किया गया कि बिंदुखत्ता क्षेत्र के निवासियों के लिए वन अधिकार अधिनियम 2006 की धारा 6 के अंतर्गत अधिकारों का दावा सबसे प्रभावी एवं वैधानिक मार्ग है। संगठनों ने यह भी स्पष्ट किया कि यह दावा पहले ही किया जा चुका है और जिला स्तरीय समिति (DLC) द्वारा स्वीकृत भी किया जा चुका है, जिसके आधार पर राजस्व गांव का दर्जा प्राप्त करने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जायेगा ।

बैठक में श्री भुवन चंद्र पोखरिया के विरुद्ध निंदा प्रस्ताव भी सर्वसम्मति से पारित किया गया। संगठनों का कहना है कि वे न तो बिंदुखत्ता क्षेत्र के निवासी हैं और न ही इस क्षेत्र से उनका कोई प्रत्यक्ष हित जुड़ा है। इसके अतिरिक्त, पूर्व में उन्हें इस प्रकार की याचिका न दायर करने के लिए वन अधिकार समिति द्वारा अवगत कराया गया था, फिर भी उनके द्वारा याचिका दायर कर क्षेत्र में भ्रम की स्थिति उत्पन्न की गई है।
वन अधिकार समिति एवं पूर्व सैनिक संगठन ने मीडिया से अपील की है कि तथ्यों का संतुलित एवं जिम्मेदार प्रस्तुतीकरण किया जाए, ताकि क्षेत्र में अनावश्यक भ्रम एवं निराशा का वातावरण न बने।




