“पूजा में सिर ढंकना शास्त्रसम्मत नहीं, यह प्रथा भ्रामक है”: कथा वाचक कीर्ति बल्लभ
नई दिल्ली। हाल के वर्षों में पूजा-पाठ, जप और ध्यान के दौरान सिर पर रूमाल या कपड़ा ढकने की प्रथा तेजी से फैल रही है, लेकिन प्रसिद्ध कथा वाचक कीर्ति बल्लभ ने इसे शास्त्र-विरुद्ध और भ्रामक बताया है। उन्होंने विभिन्न पुराणों और धर्मग्रंथों के प्रमाणों के आधार पर स्पष्ट किया कि देव-पूजन, जप, ध्यान तथा प्रणाम के समय सिर खुला रखना चाहिए। सिर ढकना केवल शौच के समय उचित है, न कि भगवान की आराधना में।
कीर्ति बल्लभ ने एक धार्मिक सभा को संबोधित करते हुए कहा, “आजकल पूजन आरंभ होते ही लोग रूमाल निकालकर सिर पर रख लेते हैं। यह कुप्रथा है। शास्त्र पूजा में सिर ढकने को निषेध करते हैं। शौचावस्था में ही सिर ढकने का विधान है। प्रणाम, जप और देव-पूजा के समय सिर खुला रखने से ही शास्त्रोक्त फल प्राप्त होता है।”
शास्त्रीय प्रमाणों का विस्तार
कीर्ति बल्लभ ने अपनी बात को मजबूत करने के लिए कई प्राचीन ग्रंथों के श्लोकों का हवाला दिया:
जप की निष्फलता पर —
“उष्णीषो कञ्चुकी चात्र मुक्तकेशी गलावृतः । प्रलपन् कम्पनश्चैव तत्कृतो निष्फलो जपः ॥”
अर्थात् पगड़ी (सिर ढककर), कुर्ता पहनकर, शिखा खोलकर, गले में वस्त्र लपेटकर, बोलते हुए या काँपते हुए किया गया जप निष्फल हो जाता है।
शुद्धि के नियम पर (कुर्म पुराण, अध्याय 13, श्लोक 9) —
“शिर: प्रावृत्य कण्ठं वा मुक्तकच्छशिखोऽपि वा । अकृत्वा पादयोः शौचमाचांतोऽप्यशुचिर्भवेत् ॥”
सिर या कण्ठ को ढककर, शिखा और कच्छ (लंगोट/धोती का पिछला भाग) खुला रखकर, बिना पैर धोए आचमन करने से भी व्यक्ति अशुद्ध रहता है। पहले सिर और कण्ठ से वस्त्र हटाएं, शिखा बांधें, पैर धोएं, फिर आचमन करें। तभी देव-पूजन योग्य शुद्धता प्राप्त होती है।
ध्यान में निषेध —
“शिरः प्रावृत्य वस्त्रोण ध्यानं नैव प्रशस्यते।”
वस्त्र से सिर ढककर भगवान का ध्यान कभी प्रशस्त (उत्तम) नहीं माना गया है।
शिव महापुराण का प्रमाण (उमा खंड, अध्याय 14) —
सिर पर पगड़ी रखकर, कुर्ता पहनकर, नंगे रहकर, बाल खोलकर, गले में कपड़ा लपेटकर, अशुद्ध हाथों से या बोलते हुए जप कभी नहीं करना चाहिए।
कीर्ति बल्लभ ने जोर देकर कहा कि लोग सिर ढकने को सम्मान का प्रतीक समझते हैं, जबकि शास्त्र देव-कार्य और सम्मान के लिए सिर खोलने का ही विधान करते हैं। उन्होंने पूछा, “क्या हम शास्त्रों की मर्यादा का पालन करते हुए पूजा का पूरा फल प्राप्त कर पा रहे हैं? इस पर विद्वानों को मंथन करना चाहिए।”
चर्चा और प्रभाव
कीर्ति बल्लभ का यह बयान धार्मिक हलकों में काफी चर्चा का विषय बन गया है। एक ओर परंपरागत रूप से सिर ढककर पूजा करने वाले लोग अपनी प्रथा को जारी रखे हुए हैं, वहीं शास्त्र-जागरूक वर्ग इसे पुनर्विचार की मांग कर रहा है। कई लोग अब सोशल मीडिया पर इन श्लोकों को शेयर कर इस मुद्दे पर बहस कर रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी प्रथाएं समय के साथ लोक-व्यवहार में शामिल हो जाती हैं, लेकिन शास्त्रीय आधार की जांच जरूरी है। कीर्ति बल्लभ का संदेश स्पष्ट है — पूजा शास्त्रानुसार होनी चाहिए, ताकि भक्त को पूर्ण फल मिले।
यह बयान भक्तों को अपनी पूजा-पद्धति पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित कर रहा है। शास्त्रों का अध्ययन और विद्वानों से मार्गदर्शन लेकर ही धार्मिक क्रियाओं को शुद्ध रखा जा सकता है।
(शब्द संख्या: लगभग ४००)
यह खबर मूल बयान के शास्त्रीय संदर्भों को प्रमुखता देते हुए, संतुलित और जानकारीपूर्ण तरीके से तैयार की गई है।
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