गढ़वाल-कुमाऊँ के छोटी जोत किसानों की उपज अब सीधे ITBP तक, लेकिन जंगली जानवर और सिंचाई का संकट बना बड़ी चुनौती
देहरादून। सरकार ने ‘वाइब्रेंट विलेज कार्यक्रम’ के तहत आईटीबीपी और उत्तराखंड हॉर्टिकल्चर काउंसिल के बीच एमओयू कर पर्वतीय क्षेत्रों के छोटे किसानों को बड़ी राहत देने का दावा किया है। इस व्यवस्था के तहत अब चमोली, उत्तरकाशी, पिथौरागढ़, चंपावत समेत राज्यभर में तैनात आईटीबीपी की बटालियनों को स्थानीय स्तर पर ताजे फल और सब्जियों की आपूर्ति की जाएगी।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इस समझौते को राज्य के किसानों और सीमावर्ती क्षेत्रों के समग्र विकास की दिशा में अहम कदम बताते हुए कहा कि इससे गढ़वाल-कुमाऊँ के छोटे किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य मिल सकेगा। सरकार का दावा है कि आईटीबीपी अपनी वार्षिक मांग का 25 प्रतिशत फल एवं सब्जियाँ स्थानीय स्तर से खरीदेगी, जिससे किसानों को लगभग ₹6 करोड़ की अतिरिक्त आमदनी होगी। अब तक आईटीबीपी ₹14 करोड़ 77 लाख के स्थानीय उत्पाद खरीद चुकी है।
उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में कृषि की स्थिति बेहद चुनौतीपूर्ण है। आंकड़े बताते हैं कि गढ़वाल और कुमाऊँ के पर्वतीय क्षेत्रों में कुल कृषि योग्य भूमि मात्र 4 से 5 प्रतिशत ही है। इसमें भी सिंचाई योग्य भूमि महज 1 से 2 प्रतिशत है, जबकि अधिकतर खेती पूरी तरह वर्षा पर निर्भर है।
इससे भी बड़ी समस्या है जंगली जानवरों का आतंक। बंदर, लंगूर, सूअर और अन्य वन्यजीव फसलों को बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचाते हैं। ऐसे में जो थोड़ी-बहुत उपज होती है, वह भी सुरक्षित नहीं रह पाती।
‘सरकार का कदम अच्छा, लेकिन उपज बचेगी तभी बिकेगी’ : स्थानीय लोगों की प्रतिक्रिया
पिथौरागढ़ के एक छोटे किसान दिनेश राम ने कहा, “सरकार ने आईटीबीपी से हमारी उपज खरीदने का जो इंतजाम किया है, वह अच्छा है। लेकिन सवाल यह है कि उपज पैदा होगी तभी तो बिकेगी। बंदरों और सूअरों ने खेती छीन ली है। आधी रात को खेतों की रखवाली करनी पड़ती है, फिर भी फसल नहीं बचती।”
चमोली के ग्राम प्रधान भुवन सिंह ने कहा, “हमारे यहाँ 90 फीसदी खेती बारिश पर निर्भर है। अब बारिश भी अनिश्चित हो गई है। सरकार ने खरीद की व्यवस्था तो कर दी, लेकिन उत्पादन बढ़ाने के लिए सिंचाई और वन्यजीवों से सुरक्षा जैसे मूलभूत मुद्दों पर भी ध्यान देना होगा।”
उत्तरकाशी की किसान सरिता देवी ने कहा, “हमारे पास जमीन तो है, पर इतनी कम कि उससे सिर्फ घर की सब्जी निकल जाती है। सरकार को बंदोबस्ती भी करना चाहिए । “
सरकार के सामने बड़ी चुनौती: उत्पादन बढ़ाना और उपज सुरक्षित करना
विशेषज्ञों का मानना है कि पर्वतीय क्षेत्रों में कृषि को बढ़ावा देने के लिए जहाँ एक ओर बाजार उपलब्ध कराना जरूरी है, वहीं दूसरी ओर सिंचाई के साधनों का विस्तार और वन्यजीवों से फसल सुरक्षा जैसे मुद्दों पर भी ठोस काम करने की आवश्यकता है।
‘वाइब्रेंट विलेज कार्यक्रम’ के तहत यह एमओयू सरकार की ओर से एक सकारात्मक पहल तो है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि छोटी जोत वाले किसानों के सामने उपजाऊ भूमि की कमी, सिंचाई का अभाव और जंगली जानवरों का खतरा जैसी तीन बड़ी चुनौतियाँ हैं। अब देखना यह है कि सरकार इन चुनौतियों से निपटने के लिए क्या ठोस कदम उठाती है।
इस अवसर पर कृषि एवं कृषक कल्याण मंत्री गणेश जोशी, सचिव कृषि एस.एन. पाण्डेय, आईजी आईटीबीपी मनु महाराज, अपर सचिव आनन्द श्रीवास्तव, निदेशक उद्यान एस.एल. सेमवाल, सीईओ उत्तराखंड हॉर्टिकल्चर काउंसिल नरेन्द्र कुमार यादव और आईटीबीपी के अन्य वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे।



